नई दिल्ली: सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच विशेषज्ञों ने बच्चों और किशोरों के लिए उम्र सीमा (एज लिमिट) को आवश्यक बताया है। उनका कहना है कि कम उम्र के बच्चों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे ऑनलाइन दुनिया के सभी जोखिमों को समझकर खुद को सुरक्षित रख पाएंगे। इसलिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अभिभावकों दोनों की जिम्मेदारी है कि बच्चों के डिजिटल उपयोग पर उचित निगरानी रखी जाए।
विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया पर लंबे समय तक सक्रिय रहने से बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता और सामाजिक व्यवहार पर असर पड़ सकता है। साथ ही वे साइबर बुलिंग, गलत जानकारी, अनुचित सामग्री और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसे खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि किशोरावस्था में निर्णय लेने की क्षमता पूरी तरह विकसित नहीं होती, ऐसे में सोशल मीडिया के एल्गोरिदम और लगातार मिलने वाली सूचनाएं बच्चों को आसानी से प्रभावित कर सकती हैं। यही वजह है कि कई देशों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए न्यूनतम आयु सीमा को लेकर सख्त नियमों पर चर्चा हो रही है।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि आयु सत्यापन की मजबूत व्यवस्था, डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम और अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी बच्चों को सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उनका कहना है कि बच्चों की सुरक्षा केवल उनकी व्यक्तिगत समझ पर नहीं छोड़ी जानी चाहिए, बल्कि इसके लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, कम उम्र के बच्चे अक्सर ऑनलाइन दुनिया में मौजूद जोखिमों को पूरी तरह समझ नहीं पाते। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली आकर्षक सामग्री, वायरल ट्रेंड्स और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन उन्हें लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखते हैं। इससे पढ़ाई, नींद और वास्तविक सामाजिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि किशोरावस्था में बच्चों का मस्तिष्क अभी विकसित हो रहा होता है। इस दौरान सोशल मीडिया पर मिलने वाली प्रतिक्रियाएं, लाइक्स और फॉलोअर्स उनकी आत्म-छवि और आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकते हैं। कई मामलों में ऑनलाइन तुलना, ट्रोलिंग और साइबर बुलिंग मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं को बढ़ावा दे सकती है।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि इंटरनेट पर गलत जानकारी, भ्रामक विज्ञापन और अनुचित सामग्री तक बच्चों की आसान पहुंच एक गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे में केवल बच्चों से जिम्मेदारीपूर्ण व्यवहार की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं है। सोशल मीडिया कंपनियों, सरकारों और अभिभावकों को मिलकर एक सुरक्षित डिजिटल माहौल तैयार करना होगा।
हाल के वर्षों में कई देशों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आयु सत्यापन (Age Verification) को मजबूत बनाने और बच्चों के लिए विशेष सुरक्षा नियम लागू करने पर जोर दिया है। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर पहचान सत्यापन प्रणाली और बच्चों के लिए अनुकूल डिजिटल नीतियां ऑनलाइन जोखिमों को काफी हद तक कम कर सकती हैं।
अभिभावकों को सलाह दी गई है कि वे बच्चों के साथ डिजिटल दुनिया के बारे में खुलकर बातचीत करें, स्क्रीन टाइम पर संतुलित नियंत्रण रखें और उन्हें ऑनलाइन सुरक्षा के बुनियादी नियमों की जानकारी दें। विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक से दूरी बनाना समाधान नहीं है, बल्कि उसका सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग सिखाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
बढ़ती डिजिटल निर्भरता के दौर में यह बहस तेज हो गई है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल जागरूकता पर्याप्त है या फिर सोशल मीडिया पर सख्त उम्र सीमा और नियामक नियमों की भी जरूरत है। विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए ऐसे कदम उठाए जाने चाहिए जो उन्हें डिजिटल दुनिया के लाभ तो दें, लेकिन उसके खतरों से भी बचाकर रखें।



