
मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव, ईरान ने दी कड़ी चेतावनी; ब्रिटेन में भी राजनीतिक बहस तेज
मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। ईरान ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर उसके खिलाफ दोबारा कोई सैन्य हमला किया गया तो उसका जवाब पहले से कहीं ज्यादा विनाशकारी होगा। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि इस बार प्रतिक्रिया केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महसूस किया जा सकता है। तेहरान का मानना है कि लगातार बढ़ते दबाव और सैन्य धमकियों के बीच देश अपनी सुरक्षा और रणनीतिक ताकत को कमजोर नहीं होने देगा।
ईरानी सांसद इब्राहिम रेजाई ने अमेरिका के साथ संभावित बातचीत को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि ईरान को किसी कमजोर पक्ष की तरह नहीं बल्कि “विजयी शक्ति” की स्थिति से वार्ता करनी चाहिए। उनके अनुसार यदि तेहरान किसी प्रकार की रियायत देता है तो इससे विरोधी देशों का मनोबल बढ़ेगा और ईरान की क्षेत्रीय शक्ति कमजोर पड़ सकती है। ईरानी नेतृत्व लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि देश किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है।
इस बीच ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच कूटनीतिक टकराव भी तेज हो गया है। यूएई अधिकारियों ने आरोप लगाया कि ईरान खाड़ी देशों के खिलाफ “आतंकी गतिविधियों” और अस्थिरता फैलाने वाली कार्रवाइयों में शामिल है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं। इसके जवाब में ईरान ने यूएई पर पलटवार करते हुए दावा किया कि अमीराती प्रशासन ने इस्लामिक गणराज्य को निशाना बनाने वाले कुछ सैन्य अभियानों को समर्थन दिया है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि उनके पास ऐसे दस्तावेज और सबूत मौजूद हैं जो क्षेत्रीय सैन्य सहयोग को साबित करते हैं। इन आरोपों और जवाबी आरोपों ने दोनों देशों के रिश्तों में और अधिक तनाव पैदा कर दिया है।
दूसरी ओर, ब्रिटेन में भी एक अलग लेकिन बेहद संवेदनशील राजनीतिक बहस सामने आई है। “Britain’s Political Prisoners” नाम की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2019 के बाद से ब्रिटिश सरकार ने फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों और जलवायु कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार कई शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था के नाम पर गिरफ्तार किया गया या जेल भेजा गया। इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि राजनीतिक और कॉरपोरेट दबाव के कारण सरकार विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है।
यह बहस उस समय और तेज हो गई जब हाल ही में अदालत ने “Palestine Action” समूह पर लगाए गए प्रतिबंध को अवैध करार दिया। हालांकि सरकार ने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की है, लेकिन इस निर्णय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि लोकतांत्रिक देशों में शांतिपूर्ण विरोध को अपराध की तरह देखना चिंता का विषय है।
कुल मिलाकर, इन घटनाओं से यह साफ दिखाई दे रहा है कि सिर्फ मध्य पूर्व ही नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति में भी अस्थिरता बढ़ रही है। एक ओर ईरान, अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच तनाव गहराता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी देशों में भी राष्ट्रीय सुरक्षा, विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर बहस तेज होती जा रही है।


